भारत की दो महान विभूतिओं – महामना मालवीय और अटलजी के योगदान को देश हमेशा याद रखेगा।इनके जन्मदिन पर शत -शत नमन।

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दिल्ली [अश्विनी भाटिया ] ‘भारत रत्नस्वर्गीय महामना मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई भारत के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है।देश की सांस्कृतिक विरासत और राजनीती में विशेष योगदान है। इन दो महान विभूतियों का आज जन्मदिन है। हम समस्त देशवासी इनके देश के निर्माण और विकास में दी गई सेवायों के लिए हमेशा आभारी रहेंगें। इनके चरणों में हमारा शतशत नमन। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल जी के भारत के लोकतंत्र को मज़बूत करने और अपने नेतृत्व में भारत को विश्व का एक परमाणु संपन्न शक्तिशाली राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है।

 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म२५ दिसंबर१९२४को ग्वालियर में हुआ था।  वे पहले १६ मई से जून १९९६ तथा फिर १९ मार्च १९९८ से २२ मई २००४ तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक हैं और १९६८ से १९७३ तक उसके अध्यक्ष भी रहे। वे जीवन भर भारतीयराजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्मपांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत अनेक पत्रपत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया था और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया। वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के पहले प्रधानमन्त्री थे जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमन्त्री पद के 5 साल बिना किसी समस्या के पूरे किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मन्त्री थे। कभी किसी दल ने आनाकानी नहीं की। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता का पता चलता है।

           उल्लेखनीय है कि महामना मालवीय ने वाराणसी में पहलाकाशी  हिन्दू विष्वविधालय की स्थापना  सन् १९१६ में वसंत पंचमी के पुनीत दिवस पर की गई थी।यह एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। महामना मदन मोहन मालवीय (25 दिसम्बर 1861 – 1946) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता तो थे ही इस युग के आदर्श पुरुष भी थे। वे भारत के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, मातृ भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिये तैयार करने की थी जो देश का मस्तक गौरव से ऊँचा कर सकें। मालवीयजी सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्मत्याग में अद्वितीय थे। इन समस्त आचरणों पर वे केवल उपदेश ही नहीं दिया करते थे अपितु स्वयं उनका पालन भी किया करते थे। वे अपने व्यवहार में सदैव मृदुभाषी रहे।कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-1886) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। उसके प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी मालवीयजी ही थे जो गान्धी-युग की कांग्रेस में हिन्दू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि”मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।श्री मालवीय जी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष का कार्यकाल 1909–10; 1918–19; 1932-1933 तक रहा।हिन्दी के उत्थान में मालवीय जी की भूमिका ऐतिहासिक है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि “उसे फारसी अरबी के बड़े बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी। सनातन धर्म हिन्दू संस्कृति की रक्षा और संवर्धन में मालवीयजी का योगदान अनन्य है। जनबल तथा मनोबल में नित्यश: क्षयशील हिन्दू जाति को विनाश से बचाने के लिये उन्होंने हिन्दू संगठन का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया और स्वयं अनुदार सहधर्मियों के तीव्र प्रतिवाद झेलते हुए भी कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में भंगियों को धर्मोपदेश और मन्त्रदीक्षा दी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रनेता मालवीयजी ने, जैसा स्वयं पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा और अनेक बार धर्मो के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया।

 

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